कंप्यूटर जिस भाषा को ग्रहण कर लेती है वह भाषा उपेक्षा का हुआ शिकार

कंप्यूटर जिस भाषा को ग्रहण कर लेती है वह भाषा उपेक्षा का हुआ शिकार

सहरसा - कंप्यूटर जिस भाषा का सरल और आसानी से ग्रहण कर रही है वह भाषा सरकार के नीति और नियति के कारण   उपेक्षा का शिकार होते जा रहा है। जिले में संचालित संस्कृत विद्यालय को  न तो सरकार ध्यान दे रही है और न ही शिक्षा विभाग के अधिकारी इस और ध्यान दे रहे हैं। आज भी संस्कृत सबसे सरल , सुगम एवं बेहतर भाषा के रूप में जाना जाता है। एक समय ऐसा था जो मिथलांचल में सभी लोगों का भाषा संस्कृत होता था। पुरानी कथाओं के अनुसार आदि गुरु कृपा शंकराचार्य ने मिथलांचल कोशी के धरती महिषी में मंडन मिश्र जैसे विद्वान से शास्त्रार्थ किया और उस महिषी के धरती पर सुगा संस्कृत बोलती थी। आज जिले में संचालित किसी भी विद्यालय में न तो संस्कृत की पढ़ाई हो रही है और न ही उस और बच्चे को अग्रसरित किया जा रहा है। बच्चे को अभिभावक भी अंग्रेजी एवं गणित के तरफ ज्यादा ध्यान देने को कहते है। शोधकर्ताओं ने माना कि भारत में जितने भाषा बोली जाती है उनमें सबसे पहले और सुगम तरीके संस्कृत भाषा को कंप्यूटर ग्रहण कर लेती है।

आरएसएस द्वारा संचालित विद्या मंदिरों में नियमित होती है संस्कृत की पढ़ाई

भारत में जितने तरहों के विद्यालय है सबमें संस्कृत भाषा की पुस्तक है। लेकिन पढ़ाई बहुत कम होती है और छात्र भी इस विषय के तरफ कम ध्यान देते है। जबकि आरएसएस द्वारा जितने विद्यालय संचालित है सभी में बच्चे को बेहतर संस्कृत की शिक्षा प्रदान की जाती है। इन विद्यालय में सिर्फ संस्कृत की पढ़ाई नही होती बल्कि सभी विषयों की पढ़ाई होती है अपितु संस्कृत बच्चे को प्रथम वर्ग से ही पढ़ाया जाता है। वर्तमान समय में जिले के अंदर लगभग एक दर्जन से अधिक संस्कृत विद्यालय है लेकिन जो स्कूल से शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं उस जगह उस स्कूल में शिक्षक की नियुक्ति नही हो रही है। कई वर्षों से मध्यमा आदि परीक्षा का आयोजन नहीं हुआ है। अब सुशाशन बाबू का फिर से सरकार गठन हुआ है देखना होगा कि इन शिक्षा के तरफ ध्यान देते है अथवा आने वाले समय में संस्कृत शिक्षा का नामोनिशान मिट जाएगा।

राजीब झा - सहरसा


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