मध्य पूर्व संकट से गहराया एलपीजी संकट ?

 मध्य पूर्व संकट से गहराया एलपीजी संकट, ?

एशिया में खाना पकाने पर मंडराया खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा से एशियाई देशों की आपूर्ति प्रभावित

कोशी जोन :- मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को गहरे संकट में डाल दिया है। वर्ष 2026 में पैदा हुई यह स्थिति 1970 के दशक के दोनों बड़े तेल संकटों से भी अधिक गंभीर मानी जा रही है। इस बार संकट केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के करोड़ों परिवारों के लिए रोजाना भोजन पकाने की क्षमता पर भी असर डाल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) आज दुनिया का सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला खाना पकाने का ईंधन बन चुका है। विकासशील देशों में लगभग 3.4 अरब लोग खाना पकाने के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा विकासशील एशिया का है, जहां करीब 2.4 अरब लोग एलपीजी को मुख्य ईंधन के रूप में उपयोग करते हैं। भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों ने पिछले डेढ़ दशक में स्वच्छ खाना पकाने की दिशा में बड़े अभियान चलाए। इसके परिणामस्वरूप 2010 के बाद से 8 करोड़ से अधिक लोगों ने लकड़ी, कोयला, केरोसिन और अन्य पारंपरिक ईंधनों का उपयोग छोड़कर एलपीजी अपनाया। वर्तमान में भारत के लगभग 80 प्रतिशत और इंडोनेशिया के 90 प्रतिशत परिवार खाना पकाने के लिए एलपीजी का उपयोग करते हैं। हालांकि, दोनों देश एलपीजी के बड़े आयातक हैं और उनकी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है।

एशिया के करोड़ों लोगों की रसोई पर संकट

ऊर्जा बाजार से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में वैश्विक समुद्री एलपीजी निर्यात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था। लेकिन मार्च 2026 में संघर्ष तेज होने के बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट दर्ज की गई। परिणामस्वरूप, जलडमरूमध्य से एलपीजी निर्यात लगभग 80 प्रतिशत घट गया। यह मात्रा 2025 के औसत 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर केवल 0.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई।

मध्य पूर्व से निर्यात होने वाली लगभग पूरी एलपीजी एशियाई देशों को भेजी जाती थी। इनमें से करीब 60 प्रतिशत एलपीजी घरेलू रसोई, होटल, रेस्तरां, स्ट्रीट फूड विक्रेताओं और अन्य व्यावसायिक संस्थानों में खाना पकाने के लिए उपयोग होती थी। यह आपूर्ति लगभग 82 करोड़ लोगों की खाना पकाने की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त मानी जाती थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो एशिया के कई देशों में एलपीजी की कीमतों में तेज वृद्धि, आपूर्ति संकट और वैकल्पिक ईंधनों की ओर वापसी जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।

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